झोला छाप ख़बरी
पत्रकारिता के नाम पर पेट और परिवार पालने वाले लोग कभी भी विश्वसनीय, ईमानदार और परिवर्तन के प्रतीक नहीं होते हैं। यह बात सुनने में थोड़ी कड़वी जरूर है, लेकिन पत्रकारिता की वर्तमान परिस्थितियों में इस कड़वाहट को समझने की जरूरत है। हालांकि सवाल पेट पालने का नहीं, बल्कि पेट पालने के लिए आत्मा बेच देने का है। क्योंकि पेट तो मजदूर भी पालता है, किसान भी पालता है, दुकानदार भी पालता है और पत्रकार भी। फर्क सिर्फ इतना है कि पत्रकार के हाथ में कलम होती है, जिससे वह दूसरों की भूख, बेबसी और अन्याय की कहानी लिखता है। मगर जब उसी कलम की नोक सत्ता, विज्ञापन और व्यक्तिगत लाभ के सामने झुक जाए, तो कहानी का सबसे बड़ा पात्र पत्रकार खुद बन जाता है।
आज पत्रकारिता का एक नया बाजार सज चुका है। यहां खबरों की मंडी है, पत्रकारिता की दुकान है, विज्ञापन का तराजू है और ईमानदारी की कीमत रोज तय होती है। कोई ब्यूरो चीफ है, कोई जिला प्रतिनिधि, कोई विशेष संवाददाता, कोई राजनीतिक विश्लेषक और कोई सत्ता का स्थायी प्रशंसक। पदों की इतनी लंबी फौज है कि कभी-कभी लगता है देश में पत्रकार कम और पत्रकारिता के पदाधिकारी ज्यादा हो गए हैं।
कुछ लोगों के लिए पत्रकारिता अब जनसेवा नहीं, जनसंपर्क का ऐसा साधन बन गई है, जिसमें खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि किस मंत्री के साथ फोटो खिंची, किस अधिकारी ने फोन उठाया और किस नेता ने जन्मदिन पर शुभकामना दी।
पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता से सवाल करना था। लेकिन सवाल पूछने वाले पत्रकार अब सत्ता के दरबार में सवालों की जगह आवेदन लेकर पहुंचते हैं। कभी पत्रकार पूछता था कि जनता को पानी क्यों नहीं मिल रहा? अब पूछता है कि साहब, विज्ञापन कब मिल रहा है? पहले खबर के लिए अधिकारी का दरवाजा खटखटाया जाता था, अब विज्ञापन के लिए दरवाजे पर दस्तक दी जाती है। पहले पत्रकार खबर छापकर व्यवस्था को बेचैन करता था, अब खबर रोककर व्यवस्था को राहत देता है।
और फिर यही लोग मंच पर खड़े होकर पत्रकारिता के मूल्यों पर लंबा भाषण देते हैं। इनके भाषण में संविधान होता है, लोकतंत्र होता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है और पत्रकारिता का गौरव भी होता है। बस इनके व्यवहार में इन सबका प्रवेश निषेध होता है।
पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि पत्रकार गरीब है, बल्कि यह है कि पत्रकारिता की गरीबी को कुछ लोगों ने अपना कारोबार बना लिया है।
गरीब पत्रकार होना अपराध नहीं है। परिवार पालना कोई शर्म की बात नहीं है। पत्रकार को वेतन मिलना चाहिए, सम्मान मिलना चाहिए, सुरक्षा मिलनी चाहिए और उसके परिवार का भविष्य सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन जब पत्रकार अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जनता के हितों की बलि देने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
जो पत्रकार अपने बच्चों की फीस के लिए विज्ञापन मांगता है, वह गलत नहीं है। गलत तब है जब वह फीस के लिए जनता के सवालों की कीमत वसूलने लगे। जो पत्रकार अपनी संस्था चलाने के लिए विज्ञापन जुटाता है, वह गलत नहीं है। गलत तब है जब विज्ञापनदाता तय करने लगे कि खबर क्या होगी, खबर कौन लिखेगा और खबर किसके खिलाफ नहीं लिखी जाएगी।
पत्रकारिता और व्यापार के बीच एक लक्ष्मण रेखा होती है। दुर्भाग्य से कुछ लोगों ने उस रेखा को मिटाकर उसके ऊपर अपना कार्यालय बना लिया है।
आज पत्रकारिता में एक और शानदार व्यवस्था विकसित हो गई है। पत्रकारिता का प्रमाणपत्र, प्रेस कार्ड, ब्यूरो चीफ का पद और सत्ता के गलियारों में प्रवेश। मानो पत्रकारिता नहीं, कोई सरकारी योजना हो, जिसमें आवेदन करो और पद प्राप्त करो। कुछ जगहों पर पत्रकारिता की योग्यता खबर लिखने से नहीं, संस्था को कितना विज्ञापन दिला सकते हैं, इससे तय होती है।
आपकी खबर में कितनी सच्चाई है, यह बाद में देखा जाएगा। पहले यह बताइए कि महीने में कितने विज्ञापन ला सकते हैं!
ऐसे पत्रकारों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि वे खबर लिखने से पहले फोन कर लेते हैं “साहब, खबर लगा दूं क्या?” साहब की अनुमति मिल जाए तो खबर प्रकाशित, अन्यथा लोकतंत्र के हित में खबर स्थगित!
और जब कोई स्वतंत्र पत्रकार बिना अनुमति के खबर छाप देता है, तो उसे पत्रकारिता की मर्यादा, संस्थागत अनुशासन और संबंधों की दुहाई दी जाती है। यहां मर्यादा का अर्थ स्पष्ट है सत्ता नाराज नहीं होनी चाहिए, विज्ञापन बंद नहीं होना चाहिए और परिवार की मासिक व्यवस्था प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि पत्रकारिता आखिर किसके लिए है? सत्ता के लिए, विज्ञापनदाता के लिए, मालिक के लिए या उस आम आदमी के लिए, जिसकी आवाज व्यवस्था तक पहुंचाने का दावा किया जाता है?
पत्रकारिता में परिवर्तन का प्रतीक वही बन सकता है, जो अपने हितों से ऊपर उठकर समाज के हितों को प्राथमिकता दे। इसका मतलब यह नहीं कि पत्रकार संन्यासी बन जाए, परिवार छोड़ दे या भूखा रहकर ईमानदारी का प्रमाणपत्र हासिल करे। पत्रकार भी इंसान है। उसके भी सपने हैं, जिम्मेदारियां हैं और आर्थिक जरूरतें हैं। लेकिन उसके पेशे की प्रकृति ऐसी है कि उसके व्यक्तिगत हित और सार्वजनिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन जरूरी है।
जो व्यक्ति हर खबर में अपना लाभ खोजता है, वह खबर नहीं, अवसर तलाश रहा होता है।
आज सबसे बड़ा सवाल उन पत्रकारों से है, जो हर सरकार के साथ अपनी विचारधारा बदल लेते हैं। सरकार बदलती है तो इनकी पत्रकारिता का रंग बदल जाता है। विपक्ष में रहते हुए जो नेता भ्रष्टाचार का प्रतीक था, सत्ता में आते ही विकास पुरुष बन जाता है। जो कल लोकतंत्र का दुश्मन था, आज लोकतंत्र का रक्षक बन जाता है। इनकी कलम में ऐसी अद्भुत लचक है कि योगासन करने वाले भी शर्मिंदा हो जाएं।
इनके लिए पत्रकारिता का कोई स्थायी सिद्धांत नहीं है। स्थायी है तो सिर्फ सुविधा, संपर्क और लाभ।
और फिर ये लोग स्वतंत्र पत्रकारिता की बात करते हैं!
स्वतंत्रता का अर्थ क्या है? किसी भी सत्ता के सामने सवाल पूछने की क्षमता। किसी भी विज्ञापनदाता के खिलाफ तथ्य प्रकाशित करने का साहस। किसी भी राजनीतिक दल की गलतियों को उजागर करने की निष्पक्षता। यदि पत्रकार केवल अपने पसंदीदा नेता से सवाल करता है और दूसरे नेता की गलतियों पर मौन रहता है, तो वह पत्रकार नहीं, राजनीतिक प्रचारक है।
पत्रकारिता में ईमानदारी का अर्थ यह नहीं कि पत्रकार कभी गलती नहीं करेगा। ईमानदारी का अर्थ है कि गलती होने पर उसे स्वीकार करेगा। खबर गलत होने पर सुधार करेगा। दबाव आने पर तथ्य नहीं बदलेगा। और यदि किसी खबर से उसका व्यक्तिगत हित प्रभावित होता है, तो वह पाठक के भरोसे को प्राथमिकता देगा।
समाज को ऐसे पत्रकारों की जरूरत है, जो सत्ता से सवाल करें, लेकिन स्वयं भी सवालों से भागें नहीं। जो जनता की आवाज बनें, लेकिन जनता के नाम पर अपनी दुकान न चलाएं। जो पत्रकारिता को पेशा मानें, लेकिन उसकी आत्मा को व्यापार की रसीद में न बदलें।
क्योंकि अंततः पत्रकारिता का मूल्य उसके प्रेस कार्ड, पदनाम, कार्यालय, गाड़ी या राजनीतिक संपर्कों से नहीं तय होता। उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि जब किसी गरीब के साथ अन्याय हुआ, तब पत्रकार ने क्या किया? जब सत्ता ने सच दबाने की कोशिश की, तब पत्रकार ने क्या किया? जब विज्ञापनदाता ने खबर रोकने का दबाव बनाया, तब पत्रकार ने क्या किया?
पत्रकारिता पेट पालने का पेशा जरूर है, लेकिन केवल पेट पालने के लिए की गई पत्रकारिता परिवर्तन का प्रतीक नहीं बन सकती।
जिस दिन पत्रकार अपनी कलम से पहले अपने लाभ का हिसाब लगाने लगेगा, उस दिन खबर मर जाएगी और प्रेस कार्ड जिंदा रहेगा।
और यही पत्रकारिता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा पत्रकार मौजूद होंगे, अखबार प्रकाशित होंगे, चैनल चलेंगे, पोर्टल चमकेंगे, लेकिन जनता के सवालों का कोई जवाब नहीं होगा।
मैं रहूं या न रहूं, पत्रकारिता जिंदा रहनी चाहिए। लेकिन ऐसी पत्रकारिता नहीं, जो सत्ता के सामने सजदा करे और जनता के सामने ईमानदारी का भाषण दे।
कलम के रक्षक बनिए, कलम के भक्षक नहीं।
क्योंकि पत्रकारिता की असली पहचान पेट नहीं, उसकी रीढ़ है। पेट भूखा रह सकता है, परिवार परेशान हो सकता है, लेकिन अगर कलम की रीढ़ टूट गई, तो फिर पत्रकारिता केवल एक कारोबार रह जाएगी और कारोबार की दुकानें बहुत हैं, समाज को पत्रकार चाहिए।



