दस राज्यों के पत्रकारों ने उठाया सवाल, क्या चौथे स्तंभ को मिलेगा संवैधानिक संरक्षण?
अंबिकापुर बना राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र, पत्रकारों ने उठाया संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा
आदित्य गुप्ता
अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में आयोजित “साउथ एशिया जन सरोकार सम्मान” एवं “द एक्टिविस्ट नेशनल अवार्ड 2026” के मंच से देशभर के पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनपक्षधर बुद्धिजीवियों ने भारतीय लोकतंत्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास किया। कार्यक्रम में दस राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता को संविधान में स्पष्ट एवं प्रभावी संवैधानिक मान्यता प्रदान किए जाने की मांग उठाई।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना प्रसारण का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। यह जनता की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने, सामाजिक न्याय के मुद्दों को उजागर करने तथा जनहित से जुड़े विषयों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का कार्य करती है। इसके बावजूद पत्रकारिता की संवैधानिक स्थिति आज भी प्रत्यक्ष रूप से परिभाषित नहीं है।
वक्ताओं ने प्रश्न उठाया कि जब न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका की भूमिकाएं संविधान में स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं, तब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में स्वीकार की जाने वाली पत्रकारिता को संवैधानिक संरक्षण एवं स्पष्ट पहचान क्यों नहीं प्रदान की गई है।
कार्यक्रम में यह भी चिंता व्यक्त की गई कि वर्तमान समय में पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक विमर्श, सत्ता-विपक्ष की बयानबाजी और कॉर्पोरेट प्रभावों के बीच सीमित होता जा रहा है। जबकि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनहित, जनजवाबदेही, भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष और आम नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करना है।
प्रतिनिधियों ने कहा कि पत्रकार केवल समाचार संकलन करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रहरी, समाज का दस्तावेजकार और नागरिक अधिकारों का संरक्षक भी है। इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और पेशेगत अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक राष्ट्रीय विमर्श तथा आवश्यक संवैधानिक एवं विधिक सुधारों की आवश्यकता है।
वक्ताओं के अनुसार अंबिकापुर से उठी यह आवाज केवल पत्रकारों के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जनोन्मुखी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह प्रयास पत्रकारिता को पुनः जनसरोकारों से जोड़ने और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में सार्थक कदम माना जा रहा है।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिनिधियों ने कहा कि पत्रकारिता को राजनीतिक ध्रुवीकरण, प्रोपेगेंडा और स्वार्थपरक प्रभावों से मुक्त कर संविधान की मूल भावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व — के साथ जोड़ना समय की मांग है। उनका मानना है कि मजबूत पत्रकारिता ही मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला है।
छत्तीसगढ़ की धरती से उठी यह संवैधानिक बहस आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक लोकतांत्रिक विमर्श का रूप ले सकती है, जो पत्रकारिता के भविष्य और लोकतंत्र की मजबूती दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी।