मौन भी अपराध है,जब अन्याय सामने हो, क्या नेता सच में जनता के हैं?
अम्बिकापुर – कहा जाता है कि एक छोटी-सी चिंगारी भी सब कुछ जलाकर राख कर सकती है। यही बात समाज, संगठन और विचारधाराओं पर भी लागू होती है। बदलाव की शुरुआत हमेशा कुछ गिने-चुने लोगों से होती है, लेकिन वही चिंगारी अगर गलत दिशा में जाए तो पूरी व्यवस्था को खोखला भी कर सकती है। अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग शुरुआत में जोश और आदर्शों के साथ किसी आंदोलन या संगठन से जुड़ते हैं। लेकिन जब उन्हें यह एहसास होता है कि उनकी व्यक्तिगत लालसा या महत्वाकांक्षा उस संगठन में पूरी नहीं होगी, तो वे विचारधारा छोड़कर भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे लोग क्रांतिकारी सोच को त्यागकर उन संगठनों के साथ खड़े हो जाते हैं, जहाँ विचार नहीं, संख्या मायने रखती है। यही कारण है कि बाद में वे न समाज के होते हैं, न व्यवस्था के बस भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।
इतिहास गवाह है कि समाज में वास्तविक परिवर्तन हमेशा मुट्ठी भर लोगों ने ही किया है। बहुसंख्यक लोग अक्सर मूक दर्शक बने रहते हैं। भीड़ का हिस्सा बनने से न पहचान बनती है, न इतिहास में जगह मिलती है। परिवर्तन वही लोग लाते हैं, जो जोखिम उठाते हैं, अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं और अपने विचारों से समझौता नहीं करते। क्रांति का आधार केवल विरोध नहीं, बल्कि आपसी विश्वास भी है। सच्चे क्रांतिकारी एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, एक-दूसरे की रक्षा करते हैं और साथियों की सफलता को अपनी खुशी मानते हैं। जब कोई साथी असफल होता है, तो उसे व्यक्तिगत हार समझकर फिर से खड़े होने की ताकत देते हैं। यही सामूहिक भावना किसी भी आंदोलन को मजबूत बनाती है। आज के हालातों में समाज को इंसानियत की सबसे अधिक जरूरत है। जरूरतमंदों की मदद, पीड़ितों के साथ खड़े होने का साहस और स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचने वाले लोग ही बदलाव की असली ताकत हैं। जहाँ तक राजनीति का सवाल है, यह भ्रम अब टूटना चाहिए कि नेता जनता के लिए राजनीति करते हैं। अधिकांश नेता केवल चुनाव जीतने और सत्ता हासिल करने की रणनीति में लगे हैं। जनता, पीड़ा और संवेदना उनके एजेंडे में पीछे छूट जाती है। ऐसे समय में सवाल उठाना, सच बोलना और सोचने को मजबूर करना ही असली क्रांति है। आज जरूरत है चुप्पी तोड़ने की क्योंकि कभी-कभी एक छोटी-सी चिंगारी ही पूरे समाज को रोशनी भी दे सकती है।