कृषि में नवाचार: बालाघाट में छत पर विकसित हुआ “सिटी फार्मिंग” का आदर्श मॉडल
500 से अधिक प्रजातियों के बीजों का संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन की अनूठी पहल
कम जगह, कम पानी… फिर भी भरपूर उत्पादन: छत पर उग रही 130 किस्म की टमाटर
रसायनमुक्त खेती की अनोखी पहल, बालाघाट बना शहरी कृषि का मॉडल
आदित्य गुप्ता
बालाघाट (मध्यप्रदेश)। बालाघाट जिले के ग्राम गर्रा में प्राकृतिक खेती की दिशा में एक प्रेरणादायी पहल सामने आई है। यहां डॉ. भीकम चौहान, जिन्हें “बायोडायवर्सिटी मैन ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है, ने अपनी टीम—श्री सुनील दत्त खरगल (कार्बन मैन ऑफ इंडिया) एवं श्री भगवान सिंह सिंगोरिया (इको मैन ऑफ इंडिया)—के साथ मिलकर छत पर आधारित एक अभिनव “सिटी फार्मिंग मॉडल” विकसित किया है।
रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए डॉ. चौहान पिछले 15 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन और स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया है।
कम लागत में शहरी कृषि का सफल प्रयोग
सीमित संसाधन, कम पानी, कम मिट्टी और छोटे स्थान में विकसित यह मॉडल शहरी परिवारों के लिए प्रेरक उदाहरण बन रहा है। छत पर स्थापित पोषक गृह वाटिका (किचन गार्डन) के माध्यम से वर्षभर सब्जियाँ, शाक, कंद, मसाले और औषधीय पौधों का उत्पादन किया जा रहा है। इससे परिवारों को ताजा, रसायनमुक्त और पौष्टिक आहार उपलब्ध हो रहा है।
500 से अधिक बीजों का संरक्षण
डॉ. चौहान और उनकी टीम द्वारा स्थापित बीज बैंक में 500 से अधिक आनुवंशिक रूप से शुद्ध पारंपरिक बीज संरक्षित किए गए हैं। इनमें विलुप्तप्राय धान्य, श्रीअन्न (मिलेट्स), पारंपरिक अनाज, सब्जियाँ, घास बीज और औषधीय प्रजातियाँ शामिल हैं।
संरक्षित बीजों में 130 किस्म के टमाटर, 100 प्रकार के धान, 50 प्रकार की लौकी, 17 प्रकार के मिलेट्स तथा अनेक पारंपरिक सब्जियों और अनाजों की किस्में शामिल हैं। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की लगभग 1000 पारंपरिक धान प्रजातियों में से 100 से अधिक दुर्लभ किस्मों—जयप्रकाश, रामभोग, संजीवनी, अंबे मौर, जीरा शंकर, गोविंद भोग, काली कमोद, दुबराज बारीक आदि—का संरक्षण किया गया है।
“Struggle For Change” के तहत बीज विनिमय
Struggle For Change संस्था के अभियान के अंतर्गत आदिवासी अंचलों में “बीज मित्र” कार्यक्रम चलाया जा रहा है। बीज विनिमय के माध्यम से पारंपरिक किस्मों को पुनर्जीवित कर स्थानीय किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।
क्या है टिकाऊ/वैदिक खेती मॉडल?
यह मॉडल पूर्णतः प्राकृतिक और गौ-आधारित कृषि पद्धति पर आधारित है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता। पंचगव्य, सिंग खाद, जेर खाद, समाधि खाद, जंगल की मिट्टी से तैयार जीवाणु कल्चर, नीम अर्क, फल एंजाइम, ताम्र छाछ और अग्निहोत्र भस्म जैसी पारंपरिक विधियों का उपयोग किया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक कम लागत में रोगमुक्त, पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन देने के साथ-साथ जैव विविधता संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह सिटी फार्मिंग मॉडल न केवल शहरी कृषि को नई दिशा दे रहा है, बल्कि जैव विविधता संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली की ओर समाज को प्रेरित कर रहा है।