शहीदों के सपनों का भारत या वीआईपी कल्चर का गणराज्य?
ग्राम पंचायतों की जवाबदेही से ही रुकेगा ग्रामीण पलायन, टैक्स के हर पैसे का हिसाब जनता को देना होगा
लोकतंत्र गांव से शुरू होता है, लेकिन गांव ही सबसे उपेक्षित
आदित्य गुप्ता
सरगुजा – भारत गाँवों का देश है, लेकिन आज़ादी के सात दशक बाद भी गाँवों की बुनियादी समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं। विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि ग्राम पंचायतों को संकीर्ण हितों और औपचारिकताओं से ऊपर उठकर वास्तविक ग्राम विकास पर ध्यान देना होगा, तभी ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन रोका जा सकेगा। ग्राम पंचायत देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव है और उसका सुचारु रूप से कार्य करना न केवल गाँवों, बल्कि पूरे राष्ट्र के हित में अनिवार्य है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई पंचायतों में सचिव, कर्मचारी और जिम्मेदार अधिकारी ज़मीनी हकीकत से कटे हुए हैं। मोटी तनख्वाह और सुविधाएँ लेने के बावजूद जनसमस्याओं के प्रति संवेदनशीलता का अभाव दिखाई देता है। सवाल उठता है कि क्या ऐसी परिस्थितियों में कोई खंड विकास अधिकारी, ग्राम विकास अधिकारी, विधायक या सांसद आम ग्रामीण की तरह जीवन जीना पसंद करेगा? जवाब स्पष्ट है—नहीं। लेकिन सैकड़ों-हजारों ग्रामीण इसी व्यवस्था की मार झेल रहे हैं, यह एक कड़वा और अकाट्य सत्य है।
वक्ताओं ने याद दिलाया कि देश की आज़ादी के लिए चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, महात्मा गांधी सहित लगभग सात लाख बलिदानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया। ऐसे त्याग और सेवा-भाव से प्रेरित लोगों को ही पंच, सरपंच, जनपद अध्यक्ष, पार्षद, जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक, सांसद से लेकर देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचना चाहिए।
साथ ही यह माँग भी तेज़ हुई कि जनता से वसूले गए टैक्स के एक-एक पैसे का सार्वजनिक हिसाब दिया जाए। टैक्स की राशि का उपयोग केवल जनकल्याण—शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी और रोज़गार—पर होना चाहिए, न कि वीआईपी कल्चर, महंगे बंगले, गाड़ियाँ और अनावश्यक सुरक्षा प्रबंधों पर। ऐसा खर्च आम जनता के पैसे का दुरुपयोग है।
सामाजिक संगठनों ने सरकार से ग्राम पंचायतों की पारदर्शिता, सामाजिक अंकेक्षण और जवाबदेही सुनिश्चित करने की माँग की है, ताकि गाँवों का वास्तविक विकास हो और ग्रामीणों को सम्मानजनक जीवन मिल सके।