जब रिश्वत ‘सिस्टम’ बन जाए, तो लोकतंत्र कैसे बचे?
जनता पूछ रही है, जवाब कौन देगा?
नार्को टेस्ट, संपत्ति जब्ती और त्वरित सजा कानून कब?
भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस सिर्फ पोस्टर तक?देश लूटने वालों पर रहम क्यों?
जनता पूछ रही है, जवाब कौन देगा?
आदित्य गुप्ता
सरगुजा – भ्रष्टाचार आज केवल एक शब्द नहीं, बल्कि आम आदमी की रोज़मर्रा की पीड़ा का नाम बन चुका है। हर नागरिक के मन में एक जैसे सवाल उठते हैं क्या कोई थाना वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त है? क्या कोई जिला, कोई विभाग, कोई तहसील ऐसी है, जहाँ बिना लेन-देन के काम हो जाता हो? इन सवालों का सबसे कड़वा सच यह है कि जवाब अक्सर मौन में छुपा होता है।
लोकतंत्र की बुनियाद भरोसे पर टिकी होती है, और भरोसा तब टूटता है जब व्यवस्था आम आदमी को बार-बार निराश करती है। फाइलों का अटकना, योजनाओं में कटौती, नियुक्तियों में सिफारिश और शिकायतों पर लीपापोती ये सब अब अपवाद नहीं, बल्कि एक स्थापित चलन बनते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप ईमानदार नागरिक खुद को असहाय महसूस करता है, जबकि बेईमान ताकतवर बनता जाता है।
आज समाज के हर वर्ग में यह भावना गहराती जा रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल नारों और अभियानों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए कठोर, त्वरित और निष्पक्ष कानून की आवश्यकता है। जनभावना यह मांग कर रही है कि बड़े भ्रष्टाचार मामलों में वैज्ञानिक जांच पद्धतियों का सहारा लिया जाए, अवैध संपत्तियों की पूरी जब्ती हो और मुकदमों का फैसला वर्षों नहीं, महीनों में हो। सजा का डर तभी असरदार होगा, जब वह समयबद्ध और अटल हो।
लेकिन इस पूरी लड़ाई में एक सवाल और भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्या हम नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं? क्या हम हर गलत लेन-देन को मजबूरी कहकर स्वीकार कर लेते हैं? अगर समाज खुद चुप रहता है, तो व्यवस्था के सुधरने की उम्मीद भी कमजोर पड़ जाती है। भ्रष्टाचार का विरोध केवल सरकार से सवाल पूछना नहीं, बल्कि अपने स्तर पर ईमानदारी को अपनाना भी है।
यह समय आत्ममंथन का है। देश को ऐसे कानूनों की जरूरत है जो भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ें, और ऐसे नागरिकों की भी, जो डर से नहीं, विवेक से खड़े हों। जब जनता की आवाज़ संगठित होगी, तभी व्यवस्था जवाबदेह बनेगी।
भ्रष्टाचार मुक्त समाज कोई सपना नहीं—यह सामूहिक संकल्प से ही संभव है। सवाल उठते रहें, क्योंकि सवाल ही बदलाव की पहली सीढ़ी हैं।