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आम नागरिक बोले: मेरी रक्षा मैं खुद करूंगा, टैक्स मत लो, जब शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सब निजी हो गए, तो टैक्स क्यों?

Archive ID #1730
आम नागरिक बोले: मेरी रक्षा मैं खुद करूंगा, टैक्स मत लो, जब शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सब निजी हो गए, तो टैक्स क्यों?

आम आदमी हो???… तो अपनी रक्षा ख़ुद करना!

लोकतंत्र में नागरिक असहाय क्यों?

सिस्टम की नाकामी का बोझ आम आदमी क्यों उठाए? अब सवाल सिर्फ सुरक्षा का नहीं, अधिकार का है…!

आदित्य कुमार

सरगुजा - आज का आम नागरिक एक अजीब दुविधा में जी रहा है। संविधान उसे अधिकार देता है, लोकतंत्र उसे सुरक्षा का भरोसा देता है, और सरकार उससे कर (Tax) लेकर वादा करती है कि बदले में उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा मिलेगी। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नज़र आती है।आज हालात ऐसे बन चुके हैं कि आम आदमी यह कहने को मजबूर है “अगर मुझे अपनी रक्षा, इलाज, पढ़ाई और रोज़गार सब कुछ खुद ही करना है, तो फिर टैक्स किस बात का?”
सड़क पर निकलते ही असुरक्षा का एहसास होता है। अपराध बढ़ रहे हैं, कानून का डर कमजोर पड़ता दिख रहा है। थाने आम आदमी के लिए न्याय का केंद्र नहीं, बल्कि डर का प्रतीक बनते जा रहे हैं। न्याय की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को न्याय मिलने से पहले हिम्मत टूट जाती है। शिक्षा का हाल यह है कि सरकारी स्कूल संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, और मध्यम वर्ग को मजबूरी में महंगे निजी स्कूलों की ओर जाना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं में सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छुपी नहीं डॉक्टर नहीं, दवाइयाँ नहीं, सुविधाएँ नहीं। नतीजा: इलाज भी निजी, खर्च भी निजी। रोज़गार की बात करें तो युवा डिग्रियाँ लेकर सड़कों पर हैं। सरकारी नौकरियाँ सीमित, निजी क्षेत्र में शोषण आम बात। फिर भी टैक्स की दरें बढ़ती जा रही हैं पेट्रोल, डीज़ल, राशन, मोबाइल, इंटरनेट… हर ज़रूरत पर टैक्स।

सवाल सीधा है जब शिक्षा मैं खुद खरीदूं, इलाज मैं खुद कराऊँ,रोज़गार मैं खुद ढूंढूं, और सुरक्षा के लिए भी मुझे खुद ही सतर्क रहना पड़े तो सरकार को टैक्स किसलिए?

यह कोई विद्रोह नहीं, बल्कि एक ईमानदार नागरिक की पीड़ा है। टैक्स चोरी गलत है, लेकिन टैक्स लेकर बुनियादी सुविधाएँ न देना उससे भी बड़ा अपराध है। लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवक होती है, मालिक नहीं। आज आम आदमी यह नहीं कह रहा कि वह जिम्मेदारी नहीं निभाएगा। वह सिर्फ इतना कह रहा है “अगर राज्य मेरी रक्षा नहीं कर सकता, तो मुझे मेरी कमाई पर पूरा अधिकार दिया जाए।”
सरकार को यह समझना होगा कि टैक्स सिर्फ राजस्व नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। और जब विश्वास टूटता है, तो सवाल उठते हैं—ज़ोरदार, तीखे और जायज़। अब वक्त है आत्ममंथन का। वरना वह दिन दूर नहीं, जब आम आदमी यह मान लेगा कि इस व्यवस्था में सुरक्षित रहने का एक ही रास्ता है अपनी रक्षा ख़ुद करना।