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मौन भी अपराध है: अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना हर नागरिक का कर्तव्य- आदित्य कुमार

Archive ID #1695
मौन भी अपराध है: अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना हर नागरिक का कर्तव्य- आदित्य कुमार

कलयुग का सबसे बड़ा अपराध: चुप्पी

अम्बिकापुर - समाज में हो रहे अन्याय और अत्याचार पर चुप रहना केवल तटस्थता नहीं, बल्कि उस अन्याय में प्रत्यक्ष भागीदारी के समान है। यदि किसी व्यक्ति के साथ अत्याचार हो रहा हो और उसे देखकर, जानकर भी कोई मौन साध ले, तो वह नैतिक रूप से उसी अपराध का हिस्सेदार बन जाता है। यह विचार आज के समय में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है, जब सूचना हर हाथ में है और अभिव्यक्ति के साधन सबके पास उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि अन्याय केवल तब नहीं होता जब वह हमारे साथ घटे, बल्कि तब भी होता है जब समाज के किसी भी व्यक्ति के अधिकारों का हनन किया जाए। चाहे वह अत्याचार किसी परिचित पर हो, किसी अजनबी पर या समाज के किसी बड़े वर्ग पर यदि उसकी जानकारी होते हुए भी हम मौन रहते हैं, तो यह चुप्पी उस अत्याचार को वैधता प्रदान करती है।
अक्सर लोग यह सोचकर पीछे हट जाते हैं कि “इसमें मेरा क्या नुकसान है?” लेकिन इतिहास और समाज दोनों गवाह हैं कि अन्याय को अनदेखा करने की आदत अंततः उसी अन्याय को हमारे दरवाज़े तक ले आती है। आज यदि हम दूसरों के लिए नहीं बोलते, तो कल जब अन्याय हमारे साथ होगा, तब हमारे लिए भी कोई आवाज़ नहीं उठाएगा। आज के डिजिटल युग में आवाज़ उठाना पहले से कहीं आसान हो गया है। सोशल मीडिया ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति का मंच दिया है। किसी के पक्ष में कुछ शब्द लिखना, सच को साझा करना, या अन्याय के विरुद्ध उठ रही आवाज़ को आगे बढ़ाना ये छोटे कदम भी बड़े सामाजिक परिवर्तन का कारण बन सकते हैं। यदि स्वयं लिखना संभव न हो, तो कम से कम सच बोलने वालों की आवाज़ को साझा करना भी एक जिम्मेदारी है। जब अन्याय व्यापक रूप ले ले, जब अधिकारों का खुला हनन हो और जब कोई व्यक्ति या समूह आपकी भी लड़ाई लड़ रहा हो, तब मौन रहना सबसे बड़ा अपराध बन जाता है। ऐसे समय में चुप्पी नहीं, सामूहिक स्वर ही परिवर्तन ला सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कलयुग है, जहाँ अक्सर फैसले बहुमत से होते हैं। यदि बहुमत सच के साथ खड़ा न हो, तो कई बार सच्चाई भी हार जाती है। इसलिए जरूरी है कि समाज का हर जागरूक नागरिक अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध उठ रही आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाए।
क्योंकि याद रखिए
मौन केवल चुप्पी नहीं, सहमति भी होता है।
और अन्याय के सामने सहमति, स्वयं अन्याय है।