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नेता, सिस्टम और जनता सब कटघरे में: सरगुजा में क्यों बिगड़ते जा रहे हालात?

Archive ID #1657
नेता, सिस्टम और जनता सब कटघरे में: सरगुजा में क्यों बिगड़ते जा रहे हालात?

सरगुजा: स्वार्थ के गड्ढे में डूबता समाज और बिखरती व्यवस्था,जब जनता ही स्वार्थ में डूब जाए, तो व्यवस्था कैसे बचे?

पेड़ों की हत्या से लेकर नशे के आतंक तक: सरगुजा की डरावनी तस्वीर

आदित्य गुप्ता

अम्बिकापुर - सरगुजा आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां भय, अराजकता और स्वार्थ ने सामाजिक चेतना को लगभग जकड़ लिया है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिले में अब आतंक, अपराध और उत्पात अपवाद नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुके हैं। सामाजिक चिंतक आदित्य गुप्ता की यह टिप्पणी कि “सरगुजा स्वार्थ के गड्ढे में गिर गया है” आज जिले की जमीनी हकीकत को बयां करती है। चारों ओर देखिए कहीं आवारा कुत्तों का आतंक है, तो कहीं गांवों में जंगली हाथियों का उत्पात। कहीं लूटपाट और वाहन चोरी की घटनाएं बढ़ रही हैं, तो कहीं हत्याएं और महिलाओं से चेन स्नैचिंग जैसे अपराध आम होते जा रहे हैं। शहर में नशे का जाल युवाओं को निगल रहा है और मनचलों की बढ़ती गतिविधियों ने सार्वजनिक स्थलों को असुरक्षित बना दिया है। रात के समय महिलाएं सड़कों पर खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं और दिन में कॉलेज व कोचिंग जाने वाले छात्र-छात्राओं के मन में भी डर बैठा हुआ है। साफ-सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। गंदगी, अव्यवस्थित कचरा प्रबंधन और उससे फैलने वाली बीमारियां प्रशासनिक उदासीनता की गवाही दे रही हैं। पर्यावरण के नाम पर हो रहे दिखावे ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है कहीं हजारों पेड़ों की कटाई हो रही है, तो कहीं पौधारोपण के नाम पर पौधों की ही “हत्या” की जा रही है। यह सब विकास नहीं, बल्कि विनाश का रास्ता है। राजनीतिक परिदृश्य भी कम चिंताजनक नहीं है। राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज है, लेकिन जनता की मूल समस्याओं पर ठोस कार्रवाई नदारद है। नेताओं के इर्द-गिर्द घूमने वाले चापलूस और स्वार्थी तत्व झूठी प्रशंसा और चमचागिरी से नेतृत्व को वास्तविक मुद्दों से दूर कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, जिस अंबिकापुर को 2025 तक विकास की बुलेट ट्रेन बनना चाहिए था, वह आज दो-दो इंजनों के बावजूद मालगाड़ी की तरह अटक-अटक कर चल रहा है और विकास के मामले में करीब एक दशक पीछे चला गया है। लेकिन इस पूरी स्थिति के लिए केवल नेता, अधिकारी या व्यवस्था ही जिम्मेदार नहीं हैं। कड़वी सच्चाई यह है कि जनता भी अपने-अपने स्वार्थ के गड्ढे में फंसी हुई है। जब तक नागरिक खुद सवाल नहीं करेंगे, गलत के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएंगे और सामूहिक जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, तब तक कोई भी व्यवस्था ईमानदार नहीं हो सकती। जैसा कि कहा जाता है किसी शहर की राजनीति और प्रशासन उसी शहर की जनता का प्रतिबिंब होते हैं। आज सरगुजा को सबसे अधिक ज़रूरत आत्ममंथन की है। डर और स्वार्थ से बाहर निकलकर नागरिक चेतना को पुनर्जीवित करने की है। अन्यथा यह “उत्पात का दौर” केवल खबरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी अंधकार में धकेल देगा।