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एक मशीन, एक जांच… फिर दरें अलग क्यों? रिपोर्ट के बाद सरकार ने मानी गड़बड़ी

Archive ID #1631
एक मशीन, एक जांच… फिर दरें अलग क्यों? रिपोर्ट के बाद सरकार ने मानी गड़बड़ी

स्वास्थ्य नहीं, मुनाफाखोरी पर शिकंजा निजी अस्पतालों पर सरकार की सख्ती

सीटी-स्कैन, एमआरआई, सोनोग्राफी अब तय दरों पर, मरीजों को बड़ी राहत

क्या कागज से जमीन पर उतरेगा फैसला? निजी अस्पतालों पर असली परीक्षा शुरू

घोषणा या क्रांति? जांच दरों पर सरकार के फैसले से उठे बड़े सवाल

आदित्य गुप्ता

रायपुर। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर मरीजों से की जा रही मनमानी वसूली और निजी अस्पतालों में जांचों की बेतहाशा दरों को लेकर बड़ा सरकारी हस्तक्षेप सामने आया है। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से प्रकाशित होने वाली अखबार को दैनिक घटती-घटना द्वारा प्रकाशित खोजी रिपोर्ट “इलाज एक, रेट अनेक!” के बाद राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग हरकत में आ गया है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि एक ही मशीन, एक ही तकनीक और एक ही प्रक्रिया के बावजूद सरकारी और निजी अस्पतालों में जांच दरों में भारी अंतर है, जिसका सीधा बोझ गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों पर पड़ रहा है। रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद स्वास्थ्य तंत्र में बड़े और निर्णायक बदलाव की तैयारी शुरू हो गई है। सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अब निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों में भी सरकारी दरों पर सीटी-स्कैन, एमआरआई, एक्स-रे, सोनोग्राफी और अन्य जांचें कराई जाएंगी। इसके साथ ही सभी निजी अस्पतालों और लैबों में रेट लिस्ट अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करनी होगी और तय दर से अधिक वसूली पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

इस मुद्दे पर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि सरकार गरीब और जरूरतमंद नागरिकों को सस्ती, पारदर्शी और सुलभ स्वास्थ्य सुविधा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ निजी अस्पतालों में होने वाली जांचों की दरें भी तय की जा रही हैं, ताकि किसी भी मरीज का आर्थिक शोषण न हो। छत्तीसगढ़ प्रदेश के अम्बिकापुर से प्रकाशित दैनिक घटती-घटना की रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकारी अस्पतालों में जहां सीटी-स्कैन और एमआरआई जैसी महंगी जांचें बेहद कम शुल्क या आयुष्मान/बीपीएल कार्ड पर निःशुल्क उपलब्ध हैं, वहीं निजी अस्पतालों में इन्हीं जांचों के लिए हजारों से लेकर पंद्रह–बीस हजार रुपये तक वसूले जा रहे हैं। मजबूरी में मरीज निजी अस्पतालों का रुख करता है और इलाज से पहले ही कर्ज के बोझ तले दब जाता है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज योग्य होने के बावजूद कई निजी अस्पताल मरीजों को बाहर की महंगी जांचें लिखते हैं, जिससे उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ती है एक तरफ बीमारी, दूसरी तरफ आर्थिक संकट। अब सरकार इस प्रवृत्ति पर भी सख्ती की तैयारी में है। हालांकि सरकार की मंशा स्पष्ट है, लेकिन सवाल अब भी कायम हैं रेट लिस्ट की निगरानी कौन करेगा, कितनी बार निरीक्षण होगा, शिकायतों पर कितनी तेजी से कार्रवाई होगी और तय दर से ज्यादा वसूली पर सजा क्या होगी? साथ ही यह भी जरूरी है कि सरकारी अस्पतालों में मशीनें चालू रहें, डॉक्टर और तकनीशियन उपलब्ध हों और मरीजों को जांच के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।

जनता की निगाहें अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। घोषणाओं से आगे बढ़कर अगर ठोस नियम, सख्त निगरानी और पारदर्शी व्यवस्था जमीन पर उतरी, तो यह फैसला स्वास्थ्य सेवाओं में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है। अन्यथा यह भी अधूरी घोषणा बनकर रह जाने का खतरा रहेगा और हार एक बार फिर मरीज की ही होगी।