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जाति नहीं, मानवता ही हमारी पहचान,कुर्सी के खेल में कुर्बान होती मानवता…!

Archive ID #1621
जाति नहीं, मानवता ही हमारी पहचान,कुर्सी के खेल में कुर्बान होती मानवता…!

फूट डालो, राज करो—आज भी ज़िंदा है ये नीति

जातिवाद की आग में झुलसता लोकतंत्र, सत्ता की भूख और जातिवाद का ज़हर….!

मानवतावाद की बात क्यों नहीं करते नेता?

मानवता बनाम जातिवाद: किस ओर जा रहा है समाज? जाति नहीं, मानवता हो राजनीति की पहचान…!

आदित्य कुमार

अम्बिकापुर - आज का भारत एक गहरे आत्ममंथन के दौर से गुजर रहा है। आज़ादी के दशकों बाद भी समाज का एक बड़ा हिस्सा जातिवाद और दलगत राजनीति के जाल में उलझा हुआ है। यह विडंबना ही है कि जिस देश की मूल संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” रही हो, वहाँ इंसान को उसकी जाति, पार्टी और वर्ग के खांचे में बाँट दिया गया है।
सच यह है कि किसी भी जाति के सभी लोग अच्छे नहीं होते और किसी भी जाति के सभी लोग बुरे भी नहीं होते। अच्छाई और बुराई व्यक्ति के कर्म, चरित्र और विचारों से तय होती है जाति या राजनीतिक झंडे से नहीं। समाज में हर जगह अच्छे लोग भी हैं और बुरे भी, लेकिन राजनीति ने इस स्वाभाविक सत्य को अपने स्वार्थ के लिए विकृत कर दिया है।
आज की राजनीति दुर्भाग्यपूर्ण रूप से सत्ता-केन्द्रित हो चुकी है। सत्ता हथियाने के लिए समाज में जातिवाद का ज़हर घोला जाता है, लोगों को आपस में लड़ाया जाता है और भावनाओं का व्यापार किया जाता है। ब्राह्मणवाद, दलितवाद, क्षेत्रवाद जैसे शब्द बार-बार उछाले जाते हैं, लेकिन मानवतावाद की बात शायद ही कोई करता है। कारण स्पष्ट है यदि मानवता की कसौटी पर राजनीति को परखा जाए, तो कई तथाकथित जननेताओं के चेहरे से नकाब उतर जाएगा।
यह सवाल ज़रूरी है कि जिन सरकारों ने जाति के नाम पर सत्ता पाई, क्या उन्होंने वास्तव में जातिगत भेदभाव मिटाया? क्या गरीबी समाप्त हुई? क्या आम आदमी का जीवन आसान हुआ? वास्तविकता यह है कि सत्ता बदलती रही, चेहरे बदलते रहे, लेकिन आम जनता की पीड़ा जस की तस बनी रही। सत्ता के गलियारों में पहुँचने वाले कुछ लोग अवश्य अथाह संपत्ति के मालिक बन गए, परंतु समाज की बुनियादी समस्याएँ आज भी वहीं खड़ी हैं।
समाज को यह समझना होगा कि जाति और पार्टी के नाम पर लड़ाकर जो लोग सत्ता पाते हैं, वे अंततः एक ही थाली के चट्टे-बट्टे होते हैं। उनका असली उद्देश्य न समाज सुधार होता है और न ही मानव कल्याण, बल्कि केवल कुर्सी और स्वार्थ। आज आवश्यकता है कि हम अपनी मूल पहचान की ओर लौटें। हमारी जाति मनुष्य है। हमारा धर्म मानवता है। हमारा कर्म सत्य को सत्य और गलत को गलत कहना है। मानवता ही वह सूत्र है जो समाज को जोड़ सकता है, न कि तोड़ सकता है। यदि हम व्यक्ति को उसकी सोच, उसके कार्य और उसके योगदान के आधार पर परखना शुरू करें, तो न केवल समाज में भाईचारा बढ़ेगा, बल्कि लोकतंत्र भी मजबूत होगा। अब समय आ गया है कि जनता जागे, समझे और सजग बने। जातिवाद की राजनीति को नकारे और मानवता के पक्ष में खड़ी हो। क्योंकि जब इंसान इंसान से जुड़ेगा, तभी एक सशक्त, समरस और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण संभव होगा।