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विश्वसनीयता के संकट से जूझती पत्रकारिता: लोकतंत्र के लिए चेतावनी

Archive ID #1481
विश्वसनीयता के संकट से जूझती पत्रकारिता: लोकतंत्र के लिए चेतावनी

विशेष रिपोर्ट |आदित्य गुप्ता

अम्बिकापुर - पत्रकारिता आज जिस अविश्वसनीयता के दौर से गुजर रही है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि लोकतंत्र के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। एक समय था जब किसी भी तथ्य को सही साबित करने के लिए अख़बार का हवाला पर्याप्त माना जाता था। पत्रकारों को समाज और राजनीतिक गलियारों में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में पत्रकारिता की वही साख और गरिमा कहीं खोती हुई नज़र आती है। सोशल मीडिया के दबाव और “सबसे पहले” की होड़ ने पत्रकारिता की गुणवत्ता पर गहरा आघात किया है। आज हालात यह हैं कि कई बार बड़े और स्थापित पत्रकार भी बिना तथ्यों की पुष्टि किए ख़बरें साझा कर देते हैं। विवेक और शोध के बजाय जल्दबाज़ी को प्राथमिकता दी जा रही है। जबकि सच्चाई यह है कि यदि महीने में एक भी रिपोर्ट पूरी रिसर्च और तथ्यों के साथ लिखी जाए, तो उसका प्रभाव वर्षों तक बना रहता है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि किसी भी ख़बर पर सहज विश्वास करना कठिन हो गया है। झूठी या भ्रामक ख़बरों के प्रसारण के बाद न तो अख़बारों पर और न ही टीवी चैनलों पर ठोस कार्रवाई होती दिखती है। पत्रकारिता की गुणवत्ता और आचार संहिता पर निगरानी रखने वाली संस्थाएं भी कई बार इस जिम्मेदारी में असफल नज़र आती हैं।

चौथे स्तंभ की कमजोरी का सीधा नुकसान आम जनता को होता है। भले ही आज सिटीजन जर्नलिज्म का दौर है, लेकिन संस्थागत पत्रकारिता का मज़बूत और भरोसेमंद बने रहना बेहद आवश्यक है। सिटीजन जर्नलिज्म की अपनी सीमाएं हैं और सीमित संसाधनों के कारण वह दबाव बनाने में उतना प्रभावी साबित नहीं हो पाता।
क्षेत्रीय स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक है। कई जगह पत्रकारों ने खुलकर अपनी राजनीतिक पसंद चुन ली है। सत्ता पक्ष के साथ रहने के बदले कुछ सुविधाएं हासिल की जा रही हैं, जिसका खामियाज़ा सीधे तौर पर गरीब और वंचित जनता को भुगतना पड़ता है। इसके उलट, ईमानदारी से ज़मीनी सच्चाई सामने लाने वाले पत्रकारों को धमकी, उत्पीड़न, जेल और यहां तक कि हत्या तक का सामना करना पड़ा है।

ऐसे हालात में पत्रकार संगठनों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उन्हें छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में निष्पक्ष और ईमानदार रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को संरक्षण देना चाहिए, चाहे वे संगठन के सदस्य हों या नहीं। सरकार को भी ऐसे पत्रकारों के हितों की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि उनकी ज़मीनी रिपोर्टिंग से नीतियों में सुधार और कमियों की पहचान संभव होती है। निष्पक्ष और मज़बूत पत्रकारिता से सभी को लाभ है जनता को सच्ची जानकारी मिलती है, सरकार को बेहतर नीति-निर्माण में मदद मिलती है, विपक्ष को अपनी बात रखने का मंच मिलता है और उद्योग जगत को भी स्थिर वातावरण मिलता है। यदि पत्रकारिता कमजोर होगी तो लोकतंत्र को नुकसान पहुंचना तय है। समय आ गया है कि पत्रकारिता अपने मूल सिद्धांतों सत्य, निष्पक्षता और जिम्मेदारी की ओर लौटे। क्योंकि मज़बूत पत्रकारिता ही मज़बूत लोकतंत्र की नींव है।