पत्रकार निष्पक्ष क्यों नहीं रह पाता? संघर्ष के दौर में मीडिया की भूमिका पर गंभीर चिंतन
पत्रकारिता: पेशा नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व..!
आदित्य गुप्ता
अम्बिकापुर – पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन आज यह स्तंभ गंभीर दबावों से जूझ रहा है। यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या पत्रकार वास्तव में निष्पक्ष हो सकता है। व्यवहारिक सच्चाई यह है कि पत्रकार पूरी तरह मूल्य-निरपेक्ष नहीं होता। वह अपने सामाजिक परिवेश, वैचारिक पृष्ठभूमि और संस्थागत सीमाओं से प्रभावित होता है। यही कारण है कि पत्रकारिता को समझने के लिए निष्पक्षता से अधिक ईमानदारी और जिम्मेदारी को केंद्र में रखना आवश्यक है।
संघर्ष और तनाव के समय पत्रकारिता की भूमिका और भी जटिल हो जाती है। ऐसे दौर में सत्ता, राजनीतिक दल, कॉरपोरेट समूह और विभिन्न हितधारक सूचना और संचार को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। सूचनाएँ सेंसर की जाती हैं, कथाओं को तोड़ा-मरोड़ा जाता है और असहमति की आवाज़ों को दबाने की कोशिश होती है। पत्रकारों को धमकियों, मुकदमों और शारीरिक हमलों तक का सामना करना पड़ता है। इन परिस्थितियों में सच तक पहुँचना और उसे सामने लाना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसके साथ ही, मीडिया संस्थानों की आर्थिक निर्भरता भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है। विज्ञापन, टीआरपी और प्रबंधन का दबाव अक्सर संपादकीय निर्णयों को दिशा देता है। परिणामस्वरूप, खोजी और जनहितकारी पत्रकारिता हाशिए पर चली जाती है, जबकि सनसनी और त्वरित निष्कर्षों को प्राथमिकता मिलती है। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। फिर भी, पत्रकारिता की सबसे बड़ी शक्ति उसका आत्म- आलोचनात्मक दृष्टिकोण है। पत्रकार का कर्तव्य है कि वह अपने पूर्वाग्रहों की पहचान करे, सवाल पूछे और स्थापित कथाओं को चुनौती दे। पत्रकारिता का उद्देश्य किसी पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर जनता को सोचने-समझने का अवसर देना है।
आज आवश्यकता है कि मीडिया साहस, नैतिकता और संवेदनशीलता के साथ अपनी भूमिका निभाए। यदि पत्रकारिता सच के प्रति प्रतिबद्ध रहे, तो तमाम दबावों के बावजूद वही लोकतंत्र की सबसे मजबूत आवाज़ बन सकती है।