आदित्य गुप्ता
अम्बिकापुर – जब कलमें बिखरी हों, तो सच्चाई की आवाज़ कमजोर पड़ती है; लेकिन जब पत्रकार एकजुट हों, तो सत्ता भी जवाब देने को मजबूर होती है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन यह स्तंभ तभी मजबूत रह सकता है जब इसे थामने वाले हाथ आपस में जुड़े हों। आज के दौर में पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह जनहित, जवाबदेही और सच्चाई की रक्षा की लड़ाई बन चुकी है। ऐसे समय में “पत्रकार एकता” एक नारा भर नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
वर्तमान परिदृश्य में पत्रकार अनेक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। राजनीतिक दबाव, आर्थिक असुरक्षा, संस्थागत संरक्षण की कमी, कानूनी उलझनें और सबसे गंभीर—सच बोलने की कीमत—इन सबने पत्रकारिता को जोखिम भरा बना दिया है। कई बार सच सामने लाने की कोशिश करने वाले पत्रकारों को धमकी, उत्पीड़न या हिंसा का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यदि पत्रकार अकेला पड़ जाए, तो उसकी आवाज़ दबाना आसान हो जाता है। लेकिन जब पत्रकार संगठित होते हैं, एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं, तब सच्चाई को दबाना उतना ही मुश्किल हो जाता है। पत्रकार एकता का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे अधिकारों की सामूहिक रक्षा संभव होती है। जब किसी एक पत्रकार पर हमला होता है, तो वह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं होता, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार होता है। यदि ऐसे मामलों में पूरे पत्रकार समुदाय की एकजुट प्रतिक्रिया सामने आए, तो न केवल दोषियों पर कार्रवाई का दबाव बनता है, बल्कि भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने का संदेश भी जाता है।
एकता से संसाधनों और सूचनाओं का बेहतर आदान-प्रदान संभव होता है। प्रशिक्षण, कानूनी सहायता, सुरक्षा उपायों की जानकारी और फील्ड अनुभवों की साझेदारी पत्रकारों को और सशक्त बनाती है। इसके साथ ही, मानसिक और सामाजिक समर्थन भी उतना ही जरूरी है। धमकी या दबाव की स्थिति में यदि पत्रकार जानता है कि उसके पीछे पूरा समुदाय खड़ा है, तो उसका मनोबल कई गुना बढ़ जाता है।
पत्रकार एकता का एक महत्वपूर्ण पहलू नैतिक एकजुटता भी है। आज जब फेक न्यूज, पेड न्यूज और पक्षपाती रिपोर्टिंग जैसे खतरे सामने हैं, तब पत्रकारिता की मूल मर्यादाओं और मानकों को सामूहिक रूप से बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। एकजुट पत्रकार ही यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि पेशे की साख बनी रहे और समाज का भरोसा मीडिया पर कायम रहे। समाज के लिए भी पत्रकार एकता का महत्व कम नहीं है। एक संगठित, निर्भीक और निष्पक्ष मीडिया ही आम जनता की आवाज़ बन सकता है, सत्ता से सवाल पूछ सकता है और व्यवस्था में सुधार का रास्ता दिखा सकता है। जब पत्रकार बिखरे होते हैं, तो समाज भी कमजोर सूचना तंत्र का शिकार होता है। अंततः यह समझना जरूरी है कि पत्रकार एकता किसी संगठन या पद तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह एक साझा चेतना है—सच के पक्ष में, अन्याय के विरुद्ध और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए। आज जरूरत है कि पत्रकार व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर एक मंच पर आएं, क्योंकि सच्चाई की यह लड़ाई अकेले नहीं, बल्कि साथ चलकर ही जीती जा सकती है।