गौ हत्या क्यों? आस्था, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल
माता कही जाने वाली गाय की हत्या पर चुप क्यों है समाज? गौवंश संकट में, आस्था बनाम लालच की टकराहट…!
आदित्य गुप्ता
सरगुजा – भारत में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार रही है। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि गाय माता है वही गाय जो हमें दूध देती है, जिसकी सेवा को ईश्वर सेवा के समकक्ष माना गया है और जिसमें देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इसके बावजूद आज सबसे बड़ा और पीड़ादायक प्रश्न यह है कि गौ हत्या आखिर क्यों हो रही है?
ग्रामीण भारत की रीढ़ कही जाने वाली गाय न केवल धार्मिक दृष्टि से पूजनीय है, बल्कि आर्थिक रूप से भी किसानों और पशुपालकों की आजीविका का अहम साधन रही है। दूध, गोबर, खेती और जैविक खाद गौवंश का योगदान बहुआयामी है। फिर भी विडंबना यह है कि आधुनिकीकरण और उपेक्षा के कारण गायें सड़कों पर भटकने को मजबूर हैं और कई जगह तस्करी व अवैध कटान का शिकार बन रही हैं।
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि गौ हत्या के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक लालच है। चमड़े का अवैध कारोबार, तस्करी और मुनाफाखोरी इसके मुख्य कारक हैं। यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि इस अमानवीय कृत्य को किसी धर्म, समुदाय या संप्रदाय से जोड़ना न केवल गलत है, बल्कि समाज को बांटने वाला भी है। ऐसे कृत्य करने वालों का कोई धर्म नहीं होता यह शुद्ध रूप से क्रूरता और अपराध है।
गौ हत्या को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यह भारतीय संस्कृति, सभ्यता और सामूहिक संवेदनाओं पर सीधा प्रहार है। यदि देश को वास्तव में पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाना है, तो गौवंश के संरक्षण, विकास और सेवा को सामाजिक संकल्प के रूप में अपनाना होगा। केवल दूध लेने तक सीमित सोच से आगे बढ़कर, हमें गाय की देखभाल, आश्रय और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना होगा।
समाज के हर वर्ग सरकार, प्रशासन, सामाजिक संगठन और आम नागरिक को मिलकर यह संदेश देना होगा कि बेजुबानों की हत्या किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। समय रहते चेतना नहीं जगी, तो इसके दुष्परिणाम केवल गौवंश तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि हमारी संवेदनशीलता और नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न बन जाएंगे।