“विरोध लिखो तो पैसा नहीं मिला होगा, चुप रहो तो पैसा मिल गया होगा!” — इस दौर में पत्रकार क्या करे?
सच लिखना गुनाह क्यों बनता जा रहा है? सवालों के कटघरे में पत्रकारिता
मीडिया और समाज- आदित्य कुमार
अम्बिकापुर – आज के समय में पत्रकारिता एक कठिन और चुनौतीपूर्ण राह बन चुकी है। जब कोई पत्रकार सत्ता, व्यवस्था या भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखता है तो उस पर तुरंत यह आरोप मढ़ दिया जाता है कि “इसे पैसा नहीं मिला होगा, तभी विरोध कर रहा है।” और जब वह किसी मुद्दे पर चुप रहता है या संतुलित रिपोर्टिंग करता है तो तंज कस दिया जाता है कि “ज़रूर पैसा मिल गया होगा।”
इस दोतरफा आरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है अब पत्रकार क्या करे?
पत्रकार का धर्म सच लिखना है। ताली मिले या ताने, सम्मान मिले या अपमान सच्ची पत्रकारिता का मूल सिद्धांत यही है कि वह बिना भय और लोभ के जनहित में सवाल उठाए। लेकिन यह कहना जितना आसान है, निभाना उतना ही कठिन।
आज का पत्रकार महीने -दर- महीने, हफ्ते-दर-हफ्ते और दिन-रात मेहनत कर भ्रष्टाचार, जनविरोधी नीतियों और काली करतूतों को उजागर करता है। वह जोखिम उठाता है, दबाव सहता है और कई बार अकेले ही पूरी व्यवस्था से टकरा जाता है। इसके बावजूद उस पर सबसे पहले शक किया जाता है उसकी नीयत पर, उसकी ईमानदारी पर। वर्तमान दौर आरोप-प्रत्यारोप का है। कोई भी खबर लिखना अब केवल सूचना देना नहीं रहा, बल्कि अपने ऊपर संकट को न्योता देना बन गया है। ऐसे में यदि किसी पत्रकार के भीतर पाँच तत्व मौजूद है।
सूंघने की शक्ति, दुरुस्त मूल्यांकन, नैतिक साहस, विषय पर मजबूत पकड़ और लिखने का कौशल, तो निराधार आरोप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। लेकिन एक सवाल फिर भी अनुत्तरित रह जाता है उसकी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? इतिहास गवाह है कि सत्ता में बैठे लोग और राजनेता हमेशा से मीडिया और पत्रकारों को अपने नियंत्रण में रखना चाहते रहे हैं। जब उन्हें किसी विरोध की आहट मिलती है, तो अचानक पत्रकार सम्मेलन, सम्मान समारोह और प्रशस्ति पत्रों की बाढ़ आ जाती है। उद्देश्य साफ होता है कलम को धार देने के बजाय उसे म्यान में बंद करना। लेकिन एक शक्तिशाली व्यक्ति किसी पत्रकार को कितनी हद तक वश में कर सकता है, यह अंततः उस पत्रकार के चरित्र और आत्मबल पर निर्भर करता है। जो पत्रकार अपने मूल्यों पर अडिग रहता है, उसे न लालच खरीद सकता है और न ही दबाव तोड़ सकता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि कोई यह नहीं सोचता कि पत्रकार का परिवार कैसे चलता है। उसकी आर्थिक स्थिति क्या है? वह किन मानसिक तनावों से गुजरता है? धमकियाँ, मुकदमे, सामाजिक बहिष्कार और अनिश्चित भविष्य ये सब उसकी रोजमर्रा की सच्चाई हैं। क्या आज कोई ऐसा संस्थान है सरकारी या गैर- सरकारी जो भ्रष्टाचार से पूरी तरह अछूता हो? यदि नहीं, तो सवाल उठाने वाले पत्रकार को ही कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है? वास्तव में माहौल अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। इसके बावजूद जो पत्रकार सच लिख रहा है, वही लोकतंत्र की असली नींव को मजबूत कर रहा है। समाज और व्यवस्था को चाहिए कि वह पत्रकारिता को संदेह की नजर से नहीं, बल्कि समर्थन और सुरक्षा की भावना से देखे। सच लिखना ही पत्रकार का धर्म है। बाकी ताली और ताने इतिहास तय करेगा कि कौन सही था।