‘बिना घूस कोई काम नहीं’ क्या हमने भ्रष्टाचार को सामान्य मान लिया है?
घूस देने वाला भी दोषी है ,भ्रष्ट व्यवस्था पर समाज का आईना
जब मौन सहमति बन जाए, तब घूस व्यवस्था बनती है..!
अम्बिकापुर – जब घूस व्यवस्था बन जाए, तब प्रश्न समाज से भी होते हैं “बिना घूस के कोई काम नहीं होता” यह वाक्य अब केवल एक आरोप या शिकायत नहीं रह गया है, बल्कि धीरे-धीरे व्यवस्था की एक स्वीकारोक्ति बनता जा रहा है। यह वह कड़वी सच्चाई है, जिसे समाज जानता है, समझता है, फिर भी अधिकांशतः अनदेखा कर देता है। आज प्रश्न यह नहीं है कि भ्रष्टाचार मौजूद है या नहीं, बल्कि यह है कि हमने उसे कितना सामान्य और स्वीकार्य बना लिया है। लगभग हर विभाग में कुछ ऐसे अधिकारी और कर्मचारी देखने को मिल जाते हैं, जो नियम-कानून को ताक पर रखकर व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देते हैं। फाइलें जानबूझकर रोकी जाती हैं, योजनाएँ अटकाई जाती हैं और आम नागरिक मजबूरी में घूस देने को विवश हो जाता है। यहीं से एक गंभीर और असहज प्रश्न खड़ा होता है क्या भ्रष्टाचार का दोष केवल लेने वाले पर है, या देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है?
शिक्षा, जागरूकता और नैतिकता की असली परीक्षा
हम स्वयं को शिक्षित, जागरूक और अधिकारों से परिचित नागरिक कहते हैं, लेकिन सुविधा, भय या समय की कमी के नाम पर जब घूस देना स्वीकार कर लेते हैं, तब हम अनजाने में ही भ्रष्ट व्यवस्था के सहभागी बन जाते हैं। शिक्षा का वास्तविक अर्थ केवल डिग्रियाँ अर्जित करना नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस पैदा करना है।
कानून मौजूद है, इच्छाशक्ति कमजोर है
देश का संविधान और कानून घूस लेने और देने दोनों को अपराध मानते हैं। इसके बावजूद, कार्रवाई अक्सर सीमित और चुनिंदा मामलों तक सिमट जाती है। जब दोषियों को समय पर और सख्त सजा नहीं मिलती, तब भ्रष्टाचार एक अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है। आवश्यकता है कि नियम तोड़ने वालों पर त्वरित, कठोर और पारदर्शी कार्रवाई हो, ताकि कानून का भय और न्याय पर विश्वास दोनों स्थापित हो सकें। भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा नुकसान विश्वास का टूटना भ्रष्टाचार केवल आर्थिक क्षति नहीं पहुँचाता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है। जब जनता का शासन-प्रशासन से भरोसा उठता है, तो ईमानदार अधिकारी हतोत्साहित होते हैं और भ्रष्ट तत्व और अधिक निडर हो जाते हैं। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए घातक है।
समाधान दंड से आगे भी है केवल सजा ही पर्याप्त नहीं।
प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण,
डिजिटल और पारदर्शी सिस्टम, शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा,और ईमानदार कर्मियों का सम्मान ये सभी मिलकर ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जहाँ घूस की गुंजाइश ही न बचे।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक नागरिक घूस देने से इनकार नहीं करेगा, तब तक घूस लेने वाला भी स्वयं को सुरक्षित समझता रहेगा।
अब समय आ गया है कि हम यह साबित करें कि हम केवल शिक्षित ही नहीं, बल्कि जागरूक, जिम्मेदार और साहसी नागरिक भी हैं।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध मौन नहीं, बल्कि स्पष्ट और निर्भीक आवाज़ ही एक स्वच्छ, न्यायपूर्ण और सशक्त भारत की मजबूत नींव रख सकती है।