पहले इंसान बनें, फिर अधिकार मांगें, अधिकार और कर्तव्य का संतुलन ही मज़बूत राष्ट्र की नींव
विशेष संवाददाता |आदित्य कुमार
भारत सहित पूरे विश्व में मानवाधिकारों को लेकर समय-समय पर चर्चाएँ होती हैं, संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं और विशेष दिवस मनाए जाते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या मानवाधिकार केवल किसी खास दिन तक सीमित हैं, या फिर यह इंसान के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा होने चाहिए? विशेषज्ञों और सामाजिक चिंतकों का मानना है कि आत्मसम्मान के साथ जीने, अपने विकास और आगे बढ़ने के लिए ऐसे हालात आवश्यक हैं जहाँ किसी भी व्यक्ति के रास्ते में भेदभाव, शोषण या अन्याय की रुकावट न आए। जब मानवीय मूल्यों की अवहेलना होती है, तब समाज स्वाभाविक रूप से सक्रिय होता है, लेकिन क्या हमें संवेदनशील होने के लिए किसी कैलेंडर की तारीख का इंतज़ार करना चाहिए? चिंतन का विषय यह है कि अगर हमारे भीतर मानवता ही नहीं बची, तो वर्ष में अनेक मानवाधिकार दिवस मना लेने से भी ज़मीनी हकीकत नहीं बदल सकती। मानवाधिकार किसी औपचारिक नारे का नाम नहीं, बल्कि वह जज़्बा है जो हर संवेदनशील इंसान के दिल में हर समय जीवित रहना चाहिए। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम दूसरों से पहले स्वयं से सवाल पूछें । क्या हम अपने घर, परिवार और समाज में रहने वाले लोगों के मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं?
क्या हम अपने व्यवहार, शब्दों और निर्णयों से किसी के अधिकारों का हनन तो नहीं कर रहे?
सामान्य रूप से मानवाधिकारों में भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, बाल शोषण और उत्पीड़न पर रोक, महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा, शारीरिक शोषण पर अंकुश, प्रवास का अधिकार, धार्मिक हिंसा से रक्षा जैसे अनेक कानून शामिल हैं। विडंबना यह है कि इन कानूनों के बावजूद हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जाने-अनजाने स्वयं ही अपने अधिकारों को कुचल देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मानवाधिकारों की वास्तविक रक्षा तब तक संभव नहीं है, जब तक गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, कुपोषण, नशा, संगठित अपराध, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, असहिष्णुता, रंगभेद और धार्मिक कट्टरता जैसी सामाजिक बुराइयों का योजनाबद्ध तरीके से निर्मूलन नहीं किया जाता।
वर्तमान हालात यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि नई और न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के बिना भारत की बहुसंख्यक जनता के लिए मौलिक अधिकार केवल काग़ज़ी शब्द बनकर रह जाएंगे। इसलिए आज ज़रूरत है कि हम अपने अधिकारों के प्रति सजग हों, लेकिन उतनी ही ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन भी करें।
यदि अधिकार और कर्तव्य दोनों का संतुलन स्थापित हो जाए, तो न केवल समाज सशक्त होगा, बल्कि भारत एक मज़बूत राष्ट्र के रूप में पूरे विश्व में अपने मूल्यों और मानवता का परचम लहरा सकेगा।