मीडिया डर के साये में? खोजी पत्रकारिता क्यों हो रही है लुप्त?
खोजी पत्रकारिता के अस्तित्व पर मंडराता खतरा
क्या सत्ता के दबाव में सिमटती जा रही है पत्रकारिता?
अम्बिकापुर – आज का दौर सवालों का है सवाल पत्रकारिता पर, सवाल पत्रकारों की स्वतंत्रता पर और सबसे बड़ा सवाल लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता पर। क्या आज मीडिया सच दिखाने से डर रहा है? क्या सरकार, सत्ता, पूंजी और दबावों के आगे कलम झुकती जा रही है? और क्या खोजी पत्रकारिता अपने अंतिम सांसों की ओर बढ़ रही है?
बीते कुछ वर्षों में पत्रकारिता के स्वरूप में जो बदलाव आया है, वह चिंताजनक है। कभी सत्ता से सवाल पूछने वाली मीडिया आज स्वयं सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई देती है। खोजी पत्रकारिता, जो कभी व्यवस्था की खामियों और भ्रष्टाचार को उजागर करने का सबसे सशक्त माध्यम थी, आज धीरे-धीरे हाशिए पर जाती नजर आ रही है।
डर, दबाव और दमन
आज सच्चाई लिखने और दिखाने वाले पत्रकारों पर हमले आम हो गए हैं। कहीं जान से मारने की धमकी, कहीं झूठे मामलों में फंसाने की कोशिश, तो कहीं महिला कानूनों के दुरुपयोग के आरोप इन सबके बीच निष्पक्ष पत्रकारिता करना किसी युद्ध से कम नहीं रह गया है। बिना समुचित जांच के पत्रकारों पर प्रकरण दर्ज होना, थानों में अपमानित किया जाना और न्यायिक आदेशों की खुलेआम अवहेलना ये सब लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
ट्रायल मीडिया और गिरती विश्वसनीयता
आज मीडिया का एक बड़ा वर्ग “पहले फैसला, फिर जांच” की प्रवृत्ति का शिकार हो चुका है। कोर्ट का निर्णय आने से पहले ही किसी को अपराधी घोषित कर देना, मामलों का महिमामंडन करना या किसी की छवि धूमिल कर देना यही कारण है कि समाज में मीडिया की साख पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। जिसे चाहे चोर और जिसे चाहे तानाशाह साबित कर देने की शक्ति जब जिम्मेदारी से अलग हो जाती है, तब अविश्वास जन्म लेता है।
शिक्षा या व्यवसाय?
पत्रकारिता कभी डिग्री या डिप्लोमा की मोहताज नहीं रही। इतिहास गवाह है कि कई ईमानदार और निर्भीक पत्रकार बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी समाज की आवाज बने। लेकिन आज पत्रकारिता की शिक्षा का अत्यधिक व्यवसायीकरण भी इस पेशे को खोखला कर रहा है। संस्थानों से निकलने वाले पत्रकारों पर बाजार, टीआरपी और कॉरपोरेट हितों का बोझ पहले ही डाल दिया जाता है।
पूंजी, राजनीति और मीडिया
डिजिटल युग में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, खर्चे बढ़े हैं और इन्हीं खर्चों को पूरा करने के लिए अधिकांश मीडिया हाउस सरकारों, पूंजीपतियों और बड़ी कंपनियों पर निर्भर हो गए हैं। विज्ञापन और आर्थिक सहायता के इस गठजोड़ ने मीडिया की आज़ादी को गंभीर खतरे में डाल दिया है। आर्थिक रूप से सक्षम दिखने वाला मीडिया आज अपनी आत्मा और पहचान खोता जा रहा है।
भविष्य का सवाल
अगर यही हालात रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब समाज सच और निष्पक्ष खबरों के लिए तरस जाएगा। खोजी पत्रकारिता केवल किताबों और इतिहास में सिमट कर रह जाएगी। सवाल यह नहीं कि मीडिया आर्थिक रूप से कितनी मजबूत है, सवाल यह है कि क्या वह आज भी अपनी आत्मा, अपनी निष्पक्षता और अपने मूल उद्देश्य को बचा पा रही है?
मीडिया लोकतंत्र का स्तंभ है अगर यह स्तंभ डर, दबाव और सौदेबाजी से कमजोर होगा, तो लोकतंत्र की इमारत भी डगमगाएगी। अब भी समय है कि पत्रकारिता आत्ममंथन करे, ईमानदारी को फिर से अपना हथियार बनाए और सत्ता से नहीं, सच से दोस्ती करे।